मकर संक्रांति: प्रकाश, परंपरा और नई शुरुआत का समग्र परिचयशास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति यह पर्व हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। यह वह शुभ क्षण है जब सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस खगोलीय घटना को हिंदू परंपरा में अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा का संकेत माना गया है। इस दिन सूर्य दक्षिणायन (दक्षिण की ओर की गति) से उत्तरायण (उत्तर की ओर की गति) की दिशा में प्रस्थान करता है। जैसे-जैसे सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है, वातावरण में गर्माहट लौटने लगती है और प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है। यह त्योहार केवल मौसम बदलने का संकेत नहीं देता, बल्कि हमारे जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इसमें सूर्योपासना, खेती-किसानी से जुड़ी परंपराएँ और सामाजिक रिश्तों की गर्माहट एक साथ दिखाई देती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकता दोनों को दर्शाता है।
मकर संक्रांति का महत्व इसके धार्मिक कर्मकांडों से कहीं आगे तक जाता है। इससे जुड़ी पौराणिक कथाएँ—जैसे पितामह भीष्म, माता यशोदा और भगीरथ से जुड़े प्रसंग—इस पर्व को त्याग, भक्ति और आत्मिक जागरण से जोड़ती हैं। यही वजह है कि मकर संक्रांति हमें दान-पुण्य, आत्मचिंतन और नकारात्मकता छोड़कर नई उम्मीद और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
मकर संक्रांति की पौराणिक कथाएँ-
भीष्म पितामह और मोक्ष-
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महाभारत युद्ध के बाद भीष्म पितामह ने मृत्यु पर अधिकार का वरदान होते हुए भी तुरंत देह त्याग नहीं किया और शास्त्रसम्मत उत्तरायण काल की प्रतीक्षा को धर्म व मोक्ष का मार्ग माना, क्योंकि वे जानते थे कि यह समय आत्मिक उन्नति के लिए श्रेष्ठ होता है।

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बाणों की शय्या पर लेटे हुए उन्होंने लगभग 58 दिनों तक संयम, धैर्य और आत्मसंयम के साथ सूर्यदेव के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की, यह दर्शाते हुए कि सही समय का चयन भी धर्म का ही एक स्वरूप है।
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मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव के उत्तरायण होते ही भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति में उन्होंने शांत भाव से देह त्याग किया; मान्यता है कि उसी क्षण उन्हें ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुई और उनका देहत्याग मोक्ष तथा परमगति का प्रतीक बन गया।
सूर्य और शनि देव का मिलन-
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्यदेव और शनि देव पिता–पुत्र हैं, पर दोनों का स्वभाव भिन्न है—सूर्यदेव तेज और ऊर्जा के प्रतीक हैं, जबकि शनि देव संयम, धैर्य और कर्मानुसार न्याय के देव माने जाते हैं; सूर्य के प्रखर तेज के कारण शनि देव का जीवन संघर्षपूर्ण रहा, फिर भी वे अपने धर्मपथ से कभी विचलित नहीं हुए।

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मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि देव से मिलने उनकी राशि मकर में प्रवेश करते हैं, जिसे पिता–पुत्र के बीच मेल-मिलाप और संबंधों में मधुरता का प्रतीक माना जाता है।
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मान्यता है कि शनि देव ने सूर्यदेव का स्वागत काले तिल से किया, जिससे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें मकर और कुंभ राशि का स्वामी होने का वरदान दिया और इस दिन उनके घर आने से धन-धान्य व समृद्धि बढ़ने का आशीर्वाद दिया; इसी कारण यह पर्व उत्तरायण, नए आरंभ और सकारात्मकता से जुड़ा माना जाता है।
भगवान विष्णु और असुरों का संहार-
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब पृथ्वी पर असुरों का आतंक बढ़ा और धर्म संकट में पड़ा, तब मकर संक्रांति के अवसर पर भगवान विष्णु ने अधर्म का नाश किया और असुरों के सिरों को मंदार पर्वत के नीचे दबाकर धर्म की रक्षा की।
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इस घटना से यह भी प्रतीक मिलता है कि मकर संक्रांति का दिन न केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व है, बल्कि धर्म की स्थापना, बुराई पर अच्छाई की जीत और संसार में संतुलन बनाए रखने का दिव्य समय भी माना जाता है।
गंगा नदी का धरती पर अवतरण-
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प्राचीन कथा के अनुसार राजा सगर के 60,000 पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे और उनकी आत्माओं को शांति नहीं मिली। अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए भगीरथ ने वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिससे मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं। उनके प्रचंड वेग को नियंत्रित करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया और फिर धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया।
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भगीरथ ने गंगा को कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँचाया, जहाँ उनके पवित्र जल से सगर के पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ। उसी दिन गंगा समुद्र में मिलीं, जिसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व को आत्मशुद्धि, पूर्वजों के उद्धार और गंगासागर स्नान से जुड़े पुण्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
मकर संक्रांति: देश के कोनों में अलग नामों से मनाई जाने वाली पर्व
उत्तर प्रदेश
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इसे खिचड़ी पर्व कहा जाता है; लोग गंगा, यमुना और सरयू में स्नान करते हैं और सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं।
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प्रमुख भोजन: तिल-गुड़, गजक, उड़द, खिचड़ी, अरहर दाल तड़की।
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खेल और उत्सव: पतंगबाजी, गिल्ली-डंडा, कबड्डी, कुश्ती, लांगड़ी।
नेपाल (माघे संक्रांति)
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त्रिशूली और बागमती नदियों में स्नान; सूर्य पूजा और परिवारिक मिलन।
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प्रमुख भोजन: तिल-लड्डू, च्यूरा (पोहा), घी, गुड़, याम (जिमीकंद)।
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पारंपरिक खेल: डंडीबियो, भैंसी लड़ाई, लाठी खेल, रस्साकशी।
बिहार
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इसे दही-चूड़ा और तिलकूट पर्व के रूप में मनाया जाता है; नदियों में स्नान।
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प्रमुख भोजन: दही-चूड़ा, तिलकूट, गजक, तिल-लड्डू, लिट्टी-चोखा।
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खेल: लाठी-दाँड, अहिरा नृत्य, कबड्डी, गुल्ली-डंडा, दंगल।
बंगाल (पौष संक्रांति)
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गंगासागर में स्नान और पूजा का विशेष महत्व।
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प्रमुख भोजन: पिठा (पतिसाप्ता, दूध-पिठा, भापा पिठा, तिल-पिठा)।
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खेल और उत्सव: पतंगबाजी, नाव दौड़, कबड्डी, लोकनृत्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम।
तमिलनाडु (पोंगल)
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चार दिवसीय उत्सव: भोगी, थाई पोंगल, मट्टू पोंगल, कानुम पोंगल।
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प्रमुख भोजन: सक्कराई पोंगल, वेन पोंगल, मुरुक्कू, अड्डई, वड़ा।
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खेल और उत्सव: जल्लीकट्टू, काना-मूची, उरियडी, सिलंबम।
असम (भोगाली माघ बिहू)
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फसल कटाई और सामूहिक भाईचारे का प्रतीक; “बिहू घर” और मेजी बोनफायर।
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प्रमुख भोजन: पिठा, लारू, मासोर तेंगा, पेया, खार।
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खेल: कुश्ती, भैंस लड़ाई, तीरंदाजी, नौकायन, रस्साकशी।
राजस्थान
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मुख्य रूप से पतंगबाजी और रंगीन उत्सव।
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प्रमुख भोजन: तिल-पापड़ी, गजक, फीणी, तिल-लड्डू, मूंगफली की चिक्की।
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खेल: दंगल, कबड्डी, ऊँट दौड़, गुल्ली-डंडा, रस्साकशी।
उत्तराखंड (घुघूती त्यौहार)
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नदियों में स्नान, सूर्यदेव को अर्घ्य और वर्षभर की समृद्धि की कामना।
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प्रमुख व्यंजन: घुघूते, अरसा, पुआ, जागरी-तिल लड्डू, गहत की दाल, भांग की चटनी।
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खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रम: कबड्डी, रस्साकशी, लोकनृत्य, गेंद-ताश।
पंजाब (लोहड़ी और मकर संक्रांति)
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लोहड़ी की पूर्व संध्या पर अग्नि जलाना, भांगड़ा-गिद्धा और तिल-गुड़ का दान।
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प्रमुख भोजन: मक्के की रोटी-सारसों का साग, तिल-गुड़, रेवड़ी, खीर।
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अगले दिन मकर संक्रांति पर नदी स्नान, दान-पुण्य और फसल की कामना।
Final Thought
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