वैकुण्ठ एकादशी हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पावन पर्व है, जो मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी(जो 15 दिसंबर से 14 जनवरी के बीच पड़ती है।) को मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु / श्रीहरि को समर्पित होता है। वैकुण्ठ एकादशी को मोक्षदा एकादशी, पुत्रदा एकादशी, मुक्कोटी एकादशी तथा कभी-कभी गीता जयंती भी कहा जाता है तथा भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित है और मान्यता है कि इसी दिन वैकुण्ठ (मोक्ष) के द्वार खुलते हैं। कहा जाता है कि इस धर्तीलोक में भी वैकुण्ठ द्वार विद्यमान(मौजूद) हैं, जो विशेष रूप से तिरुपति बालाजी और वृंदावन में माने जाते हैं। ऐसा विश्वास(आस्था) है कि यदि कोई भक्त इन वैकुण्ठ द्वारों से होकर भगवान के दर्शन करता है, तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस एकादशी का व्रत करने से भक्तों को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिलती है और समस्त पापों का नाश होता है। शास्त्रों के अनुसार वर्ष में कुल 24 एकादशियाँ होती हैं, परंतु केवल वैकुण्ठ एकादशी का व्रत करने से शेष 23 एकादशियों का पुण्य भी प्राप्त हो जाता है। यह भी कहा जाता है कि इसी पावन तिथि पर समुद्र मंथन से अमृत कलश प्रकट हुआ था जिससे इस एकादशी का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
वैकुण्ठ द्वार दर्शन और जानें क्यों यह केवल एक दिन ही खुलता है
वैकुण्ठ द्वार दर्शन-
वैकुण्ठ एकादशी से जुड़ा वैकुण्ठ द्वार दर्शन एक अत्यंत पावन परंपरा है। इस दिन माना जाता है कि भगवान विष्णु के धाम वैकुण्ठ के द्वार भक्तों के लिए विशेष रूप से खोल दिए जाते हैं। मंदिरों में एक अलग द्वार खोला जाता है, जिसे वैकुण्ठ द्वार कहा जाता है। हिंदू शास्त्रों, विशेषकर पद्म पुराण, के अनुसार वैकुण्ठ एकादशी के दिन इस द्वार से होकर दर्शन करने से भक्तों के पाप नष्ट होते हैं और उन्हें मोक्ष—अर्थात जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति—प्राप्त होती है। मान्यता है कि स्वयं भगवान विष्णु इस द्वार को खोलकर भक्तों का स्वागत अपने दिव्य लोक वैकुण्ठ में करते हैं। इसी कारण भक्त इस दिन रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और विशेष पूजा कर भगवान श्रीहरि की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

क्यों केवल एक दिन द्वार खुलता है-
एकादशी देवी के जन्म और एकादशी की शुरुआत की कथा पद्म पुराण से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार एक बार मुर नामक असुर ने देवताओं को अत्यंत कष्ट दिया और स्वयं भगवान विष्णु से युद्ध करने लगा। लंबे युद्ध के बाद भगवान विष्णु विश्राम करने बदरिकाश्रम की एक गुफा में चले गए। उसी समय मुर असुर ने भगवान पर आक्रमण करने का प्रयास किया, तभी भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य तेजस्विनी शक्ति प्रकट हुई, जिसने मुर असुर का वध कर दिया। भगवान विष्णु ने उस शक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम एकादशी देवी के नाम से पूजी जाओगी और वह दिन वैकुण्ठ एकादशी का ही पावन दिन था(अर्थात् इसी दिन से एकादशी की शुरुआत हुई थी) और जो भी मनुष्य इस तिथि पर व्रत करेगा, उसके सभी पाप नष्ट होंगे और उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी। तभी से एकादशी व्रत की परंपरा प्रारंभ हुई और एकादशी देवी को भगवान विष्णु की शक्ति और भक्तों की रक्षक माना गया। इसी एकादशी के दिन मोक्ष से जुड़ी अनेक घटनाएँ हुईं। इसी दिन तिरुपति में श्री नम्मालवार जी को मोक्ष की प्राप्ति हुई और इसी दिन वृंदावन में हरिदास जी को भी मोक्ष की प्राप्ति हुई और यही कारण है कि इसी एकादशी(वैकुण्ठ एकादशी) के दिन वैकुण्ठ के द्वार खुलते हैं।
वैकुण्ठ एकादशी की कथा-
प्राचीन काल में भद्रावतीपुरी नामक नगर में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम चम्पा था। राजा धर्मात्मा और प्रजावत्सल थे, परंतु उन्हें एक दुःख सदा व्यथित करता था — उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी। इस कारण राजा और रानी दोनों ही मन से अत्यंत व्याकुल रहते थे। यह दुःख केवल उन्हें ही नहीं, बल्कि उनके पितरों को भी संतप्त करता था, क्योंकि उन्हें यह चिंता सताती थी कि राजा के पश्चात् उनका तर्पण कौन करेगा।
एक दिन राजा अकेले ही घोड़े पर सवार होकर घने वन की ओर निकल पड़े। किसी को भी उनके जाने का पता नहीं चला। वन में विचरण करते हुए वे कभी पक्षियों की आवाज़ सुनते, कभी सियार और उल्लुओं की ध्वनि। भालू और मृग भी मार्ग में दिखाई दे रहे थे। इस प्रकार वन की शोभा निहारते-निहारते दोपहर हो गई। भूख-प्यास से व्याकुल राजा जल की खोज में इधर-उधर भटकने लगे। तभी दैवी कृपा से उन्हें एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया, जिसके समीप अनेक मुनियों के आश्रम स्थित थे। उस समय राजा के दाहिने नेत्र और दाहिने हाथ का फड़कना शुभ संकेत दे रहा था।
सरवर के तट पर ऋषिगण वेदपाठ में लीन थे। उन्हें देखकर राजा का हृदय आनंद से भर उठा। वे घोड़े से उतरकर मुनियों के समीप गए और विनम्र भाव से बार-बार प्रणाम करने लगे। मुनियों ने प्रसन्न होकर कहा, “राजन्! हम तुमसे प्रसन्न हैं।” राजा ने हाथ जोड़कर पूछा, “आप लोग कौन हैं? और यहाँ किस उद्देश्य से पधारे हैं?” ऋषियों ने उत्तर दिया, “राजन्! हम विश्वेदेव हैं। स्नान के उद्देश्य से यहाँ आए हैं। माघ मास निकट है और आज ही पुत्रदा एकादशी का पावन दिन है, जो श्रद्धा से व्रत करने वालों को संतान प्रदान करती है।”
🌸 व्रत का फल-
राजा ने विनयपूर्वक प्रार्थना की, “यदि आप लोग मुझ पर कृपा करें, तो मुझे पुत्र की प्राप्ति हो।” मुनियों ने कहा, “राजन्! आज पुत्रदा एकादशी का व्रत करो। भगवान केशव की कृपा से तुम्हें अवश्य पुत्र की प्राप्ति होगी।” फिर राजा सुकेतुमान ने मुनियों के निर्देशानुसार पूर्ण श्रद्धा और विधि से पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। द्वादशी के दिन पारण कर, मुनियों को प्रणाम कर वे अपने राज्य लौट आए। कुछ समय पश्चात् रानी चम्पा ने गर्भ धारण किया और नियत समय पर राजा को तेजस्वी, गुणवान पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसने आगे चलकर प्रजा का पालन किया और अपने पिता का नाम उज्ज्वल किया।
वैकुण्ठ एकादशी का महोत्सव: दो प्रमुख तीर्थों में विशेष धूमधाम
वैकुण्ठ एकादशी का महोत्सव भारत के दो प्रमुख तीर्थों में विशेष धूमधाम से मनाया जाता है और इसी दिन वैकुण्ठ द्वार खोला जाता है— दक्षिण भारत में तिरुपति बालाजी के वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर और उत्तर भारत में वृंदावन के रंगनाथ जी मंदिर। इस पावन अवसर पर मंदिरों में वैकुण्ठ द्वार दर्शनम्, भव्य पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण का आयोजन होता है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु भगवान विष्णु के दर्शन कर मोक्ष की कामना करते हैं।

वेंकटेश्वर स्वामी(तिरुपति बालाजी)भगवान विष्णु के कलियुग अवतार माने जाते हैं और यह धाम आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के तिरुमला पहाड़ियों पर स्थित है। वैकुण्ठ एकादशी के पावन अवसर पर तिरुपति मंदिर में विशेष रूप से वैकुण्ठ द्वार खोला जाता है, जिसे वैकुण्ठ द्वार दर्शनम् कहा जाता है। मान्यता है कि इस द्वार से भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करने से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन के समस्त कष्ट दूर होते हैं। इसी कारण इस दिन लाखों श्रद्धालु तिरुपति पहुँचकर उपवास, भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण के साथ भगवान बालाजी की आराधना करते हैं।
तिरुपति बालाजी मंदिर में वैकुण्ठ द्वार को लेकर दो बातें अत्यंत प्रसिद्ध हैं, जिनका उल्लेख हिन्दू पुराणों और वैष्णव परंपरा में मिलता है। वैष्णव संप्रदाय के महान संत श्री नम्मालवार जी नौवीं शताब्दी में तमिलनाडु के आलवार तिरुनगरी में प्रकट हुए थे। मान्यता है कि नम्मालवार जी के शरीर त्यागने के बाद स्वयं भगवान नारायण ने वैकुण्ठ के द्वार खोले, ताकि वे वैकुण्ठ में प्रवेश कर सकें। यह एक असाधारण घटना मानी जाती है, क्योंकि वैकुण्ठ के द्वार सामान्यतः भक्तों के लिए नहीं खुलते। इसी दिव्य घटना की स्मृति(याद) में तिरुपति बालाजी मंदिर तथा श्री रंगम मंदिर में वैकुण्ठ एकादशी के दिन उत्तर दिशा के द्वार (वैकुण्ठ द्वार) को खोला जाता है। इस द्वार से होकर भक्त भगवान के दर्शन करते हैं और इस विशेष अवसर पर उत्तर दिशा के द्वार को भव्य रूप से सजाया भी जाता है।
और दूसरा, श्रीरंगम मंदिर का 20 दिनों तक चलने वाला महोत्सव। श्रीरंगम मंदिर में यह पर्व(वैकुण्ठ एकादशी) पगल पत्तु और इरा पत्तु के रूप में मनाया जाता है और इस दौरान भगवान विष्णु को मोतियों का कवच पहनाया जाता है, जिनके माध्यम से पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। इसी भव्य आयोजन के साथ वैकुण्ठ एकादशी का यह पावन दिवस श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
यह महोत्सव दो मुख्य भागों में विभाजित होता है—
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पगल पत्तु (दिवसीय उत्सव): पहले 10 दिनों तक दिन
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इरा पत्तु (रात्रिकालीन उत्सव): अगले 10 दिनों तक रात
वृंदावन के श्री रंगनाथ जी मंदिर का निर्माण दक्षिण भारत की श्री वैष्णव परंपरा से जुड़े भक्तों द्वारा कराया गया था। कहा जाता है कि यह मंदिर गोविंद देव जी के सेवायत गोस्वामी परिवार और दक्षिण के वैष्णव आचार्यों की प्रेरणा से स्थापित हुआ। श्री रंगनाथ जी भगवान विष्णु (श्रीहरि) का स्वरूप माने जाते हैं, और चूँकि वृंदावन भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण की लीला-भूमि है, इसलिए इस स्थान को वैष्णव परंपरा में धरती का वैकुण्ठ कहा गया है। मंदिर की संरचना भी दक्षिण भारतीय विष्णु मंदिर शैली, विशेष रूप से श्रीरंगम परंपरा, से प्रभावित है, जो इसकी वैष्णव पहचान को और सुदृढ़ करती है। इसी वैष्णव परंपरा और भावनात्मक मान्यता के अनुरूप श्री रंगनाथ जी मंदिर में वैकुण्ठ द्वार (परमपद द्वार) का निर्माण किया गया। यह द्वार केवल एक स्थापत्य संरचना नहीं, बल्कि मोक्ष का प्रतीकात्मक द्वार माना जाता है और इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के सुसज्जित (सजाया हुआ) स्वरूप को गर्भगृह से बाहर लाया जाता है और उन्हें श्री रंगनाथ जी के मंदिर परिसर में स्थित सभी छोटी-छोटी कुटियों में ले जाया जाता है, जहाँ गोसाईं जी निवास करते हैं। मान्यता है कि पूरे वर्ष ये सभी गोसाईं जी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हेतु उनके पास जाते हैं, इसलिए इस विशेष दिन भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने भक्त गोसाईं जी से मिलने के लिए उनकी कुटियों में आते हैं। यह परंपरा भगवान और भक्त के बीच के अनन्य प्रेम( अटूट प्रेम) , स्नेह और आत्मीय संबंध को दर्शाती है क्योंकि जहाँ कृष्ण हैं, वहीं विष्णु हैं और जहाँ विष्णु हैं, वहीं वैकुण्ठ है।

वैकुंठ एकादशी पूजा विधि — Step by Step
1) सुबह जल्दी उठें (ब्रह्म मुहूर्त)
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ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल या शुद्ध जल से पूजन से पहले स्नान करें।
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साफ-सुथरे, पीले वस्त्र पहनें — यह दिन विष्णु जी के लिए शुभ माना जाता है।
2) पूजा स्थल की तैयारी
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पूजा स्थान को साफ करें और पूजा चौकी / थाल सजाएँ।
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भगवान विष्णु / नारायण की प्रतिमा या चित्र को साफ स्थान पर स्थापित करें।
3) विष्णु पूजा (मुख्य पूजा)
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विष्णु मंत्रों का जाप/चालिसा पठ करें।
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भगवान को जल, चन्दन, रोली, अक्षत (चावल), तुलसी के फूल, धूप, दीपक, फल और मिठाई अर्पित करें।
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अगर संभव हो तो लक्ष्मी सहस्त्रनाम या नारायण कवच का पाठ भी करें — यह अत्यंत शुभ माना जाता है।
4) भजन-कीर्तन / कथा पाठ
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इस दिन वैकुंठ एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
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दिन में भजन-कीर्तन और मंत्र जाप करके भगवान विष्णु की भक्ति में समय व्यतीत करें — यह जागरण की तरह पुण्यकारी माना जाता है।
5) दान-पुण्य
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दिनभर दान-पुण्य करने से विशेष पुण्य फल मिलता है —
जैसे धान, चने, पीले वस्त्र, फल, मिठाई, भगवद-गीता आदि का दान। -
जरूरतमंदों को भोजन कराना भी बहुत शुभ माना जाता है।
6) आरती
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अंत में कपूर जलाकर दीपक आरती करें और भगवान विष्णु से शांति, सुख-समृद्धि, मोक्ष की प्रार्थना करें।
🪷 व्रत के नियम
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दिनभर अन्न (चावल-दाल आदि) का सेवन न करें — निर्जला या फलाहार व्रत श्रेष्ठ माना जाता है।
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दिन में भजन-कीर्तन और शास्त्रीय पाठ में मन लगाएँ।
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यह व्रत दान-पुण्य एवं सत्य, संयम का पालन करने से फलदायी होता है।
🍛 पारण (व्रत खोलना)
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द्वादशी तिथि (11 जनवरी 2025) को सूर्योदय के बाद
शुद्ध जल स्नान > भगवान की पूजा > पारण करें। -
पारण के समय फलाहार / सात्विक भोजन ग्रहण करना शुभ माना जाता है।
वैकुण्ठ एकादशी का महत्व
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व्रत और उपवास करने से सभी पाप समाप्त होते हैं।
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भक्तों को मोक्ष प्राप्ति का अवसर मिलता है।
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भगवान विष्णु की भक्ति और पूजा से आध्यात्मिक शक्ति और मन की शांति बढ़ती है।
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यह दिन परिवार में सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि लाता है।
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रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन करने से असीम पुण्य और आंतरिक संतोष प्राप्त होता है।
।। मम सर्व पाप क्षयार्थम श्री हरि प्रत्यार्थम् वैष्ठ एकादशी व्रतम अहम करिशु।।